Sunday, 22 December 2013

आम आदमी और उसकी मुश्किले

नमस्कार मित्रों
आज एक बार फिर में आप लोगो के लिए आप ही से जुड़ा मुद्दा लेकर आया हूँ। हाल के दिनों में लगभग सभी राजनेता आम आदमी(आम आदमी पार्टी नहीं) की बात कर रहा है। राहुल गांधी मुलायम सिंह राजनाथ सिंह नीतीश कुमार मोदी जी आदि। इस से ये भ्रम ना होने पाए की ये सच में आम आदमी के हितेषी है।
ये नेता लोग अपनी सुविधा के हिसाब से अपना भाषण तैयार करते है। उस पर राहुल जी तो कमाल करते है। उन मुददों पर बोलते है जिन पर उनकी पार्टी की जिम्मेदारी है।
इस चुनावी मौसम में आम आदमी की मुश्किल ये है की वो किस नेता जी बात को सच माने और किस नेता की बात को झूठ!!!
समझ में नहीं आता है ये राजनीतिक बिरादरी आम नागरिक को क्या समझती है!
उन्हें ये लगता है की दुनिया भर की जानकारी उन्हें और उनके भाषण लिखने वालो को ही है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। ये पब्लिक है सब जानती है।
कोई गरीबी को मन की दशा बताता है कोई खुद को मुस्लिम हितेषी बताता है कोई खुद को विकास पुरूष बताता है कोई कहता है की हम सांप्रदायिक शक्तियों को आने नहीं देंगे। पर किसी को गरीब की चिंता नहीं है आलू से लेकर हरी मिर्च और चीनी से लेकर चावल तक गरीब आदमी की पहुँच से वाहर हो गये है।
किराया हर हफ्ते बढ़ जाता है। नमक जैसी जरुरी चीज महँगी हो गयी है। इन मुद्दों पर कोई बात करना नहीं चाहता है। बस एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाये जाते है। हमने ये किया तुमने ये नहीं किया।
और एक और मह्त्वपूर्ण बात गड़े मुर्दे बहुत उखाड़े जा रहे है।
रसोई गैस पेट्रोल केरोसीन तेल सब महँगा है, ऊपर से नेता लोग अपने अजीबो-गरीब बयानों से जनता का दिमाग ख़राब कर रहे है। कोई कहता है की गरीब आदमी 2 सब्जी खाने लगा है इस कारण सब्जी महँगी हो रही है कोई 5₹ में तो कोई 12₹ में खाना मिलने की बात करता है।
क्या करे इन नेताओ का सबकी अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग है।
अंत में बस इतना ही कहना है की आम आदमी को चाहिए की वो चुनाव में अपने विवेक का प्रयोग करे और सही नेता को संसद भेजे।
पढने के लिए बहुत बहुत आभार।
धन्यबाद

Saturday, 21 December 2013

ये कैसा समाजवाद??

मुलायम सिंह जी की समाजवादी पार्टी एक नए प्रकार के समाजवादी रास्ते पर चल पड़ी है। वो है जनता के पैसे को वोट बैंक की राजनीति पर कुर्बान करने का समाजवाद।
कल हुई बदांयू की रैली में मुलायम जी ने लोकतंत्र को भीडतंत्र समझ कर ये कह दिया की 26 सीटो वाले गुजरात का नेता प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता प्रधानमन्त्री तो 80 सीटो वाले उत्तर प्रदेश का नेता ही बन सकता है। ये कैसा आकलन है??
545 सदस्यो वाली लोकसभा क्या सिर्फ 80 सीट से निर्धारित होगी???
ये कैसी क्षेत्रवाद की गन्दी राजनीति है???
देश एक राज्य से नहीं बना है इस देश में 28 राज्य है 121 करोड़ की आबादी।
यूपी की जनसंख्या 20 करोड़ है जिसमे 2012 के विधानसभा के चुनाव में सपा को 29% वोट मिले अर्थात 58000000 लोगो का साथ। फिर ये किस प्रकार का आकलन है?
आप लोकपाल का विरोध करते है, महिला आरक्षण का विरोध करते है वो भी बहुत की अभद्र सीटी बजा कर। क्या इस प्रकार के नेता का प्रधानमंत्री पद के बारे में सोचना भी ठीक है???
यूपी की हालत ख़राब कर रखी है इस सपा सरकार ने। ये देश क्या सम्भाल लेंगे। जिनसे एक प्रदेश की तरक्की नहीं हो रही वो क्या देश को आगे ले जाएंगे!!!
वोट बैंक की राजनीति ने इस देश का बंटाधार कर दिया। चुनाव का समय आते ही सबको जाट मुस्लिम दलित और हर उस वर्ग की याद आ जाती है जो वोट की राजनीति में महत्त्व है। किसी को आदिवासियों गरीबो और महिलायों की फ़िक्र नहीं है। आरक्षण याद है महगाईं नजर नहीं आ रही है।
अंत में सभी पढने वालो का दिल से धन्यवाद।